लेखक 1973 में योग पिपासु बनकर श्री गुरु चरणों में संवाई आया। सन् 1974 में गंगा दशहरा के पावन पर्व पर गुरुदेव से शक्तिपात योग दीक्षा प्राप्त की। पश्चात् गुरुदेव ने इन्हें ऋषिकेश आश्रम का समस्त कार्यभार सौंप दिया। 12 वर्ष तक गुरुदेव की आज्ञानुसार ये आश्रम की सेवा करते रहे। साथ-साथ साधना पक्ष को भी दृढ़तापूर्वक बढ़ाते रहे। यहाँ रहते हुए अध्ययन कार्य भी करते रहे। गुरुदेव सदा ही इन्हें कहते “लल्ला ! अपने स्वाध्याय व शिक्षा को निरन्तर बढ़ाते रहो। भविष्य में तुम आश्रम की सेवा में काम आओगे।”
सन् 1985 में गुरुदेव ने इन्हें ऋषिकेश से श्री सिद्धगुफा, संवाई (आगरा) बुला लिया। एक विश्वस्त अन्तेवासी के रूप में गुरु चरणों में रहे। गुरुदेव की व्यक्तिगत सेवा और यदाकदा पत्रिका व्यवस्था में सहयोग आदि सारे कार्य ये निपुणता के साथ करते रहे। गुरुदेव के साथ 6–7 वर्ष तक लगातार उनके कार्यक्रमों में साथ रहे। जिससे बहुत अनुभव बढ़ा एवं गुरु चरणों की कृपा मिलती रही। वर्तमान में भी गुरुसेवा में दत्तचित्त होकर लगे हुए हैं और उनके द्वारा शुरू किये गये योग प्रचार कार्यक्रमों को चला रहे हैं।